घर पर बैठे बोर होने और टीवी से चिपके रहने की अपेक्षा मैंने तय किया की मम्मी की समृद्ध लाइब्ररी में से कोई नोवल निकाल कर पढ़ लू. लाइब्ररी छानते हुए मेरी निगाह पड़ी "चरित्रहीन" पर (शरत बाबु द्वारा लिखित उपन्यास) , चूँकि इसके बारे में मैंने बहुत सुना था तो इसे पढने के लालच को रोक नहीं पायी.अक्सर ऐसा होता है की हम किसी चीज़ से आशाये/अपेक्षाए लगा लेते हैं ओर वो उस पर उतनी खरी नहीं उतरती... हालांकि शरत बाबु का यह उपन्यास बहुत अच्छा था पर जाने क्यों यह मेरे मस्तिष्क में ही मछली के कांटे की तरह अटक गया , दिल तक पंहुचा ही नहीं. दोष उपन्यास का नहीं , ज़माना ही इतना बदल गया. हाँ अगर यह उपन्यास मैंने शरत बाबु के ज़माने में पढ़ा होता तो ज़रूर इस "चरित्रहीन" की गंगा में बह कर "पवित्र" हो जाती.
उपन्यास समाप्त कर सबसे पहला प्रश्न जो दिमाग पर छाता है वह है - आखिर संपूर्ण उपन्यास में "चरित्रहीन" कौन था? सतीश- जो स्वयं को सबसे अधम पुरुष मानता है ? सावित्री- विधवा ब्राह्मिन जिसे कुल से निकाल दिया गया? या किरणमयी - अपूर्व सुंदरी जो भूल से गलती कर बैठती है पर अंत में प्रायश्चित कर लेती है? ... पर पहले ये जानना ज़रूरी है की आज "चरित्र" और "चरित्रहीन" की हमारे लिए क्या परिभाषा है? क्या शरत बाबु के ज़माने से लेकर अब तक वही परिभाषा चली आ रही है? क्या हमारे मूल्यों में ज़रा भी परिवर्तन नहीं हुआ? क्या यह ज़रूरी है की उस ज़माने में जो "चरित्रहीन" माना जाता था वह आज भी "चरित्रहीन" ही माना जाए?
किरणमयी द्वारा एक बहुत अच्छी बात उपन्यासकार ने कही है की - राह चलते जब कोई अँधा गड्डे में गिर जाता है तो लोग उसे उठाते है , सँभालते हैं. समाज द्वारा यह बात स्वीकृत है की प्रेम अँधा होता है - पर जब यह अँधा गड्डे में गिरता है तो लोग उसे संभालने के लिए नहीं आते बल्कि उसे और गिरा कर उस पर मिटटी तक डाल देते हैं. अगर अँधा गड्डे में गिरे तो समझ में आता है पर आँख वाला गिरे तो क्या उसे माफ़ किया जा सकता है? शरत बाबु की दृष्टि में भी "चरित्रहीन" वह नहीं जो भूल से गड्डे में गिर जाए पर वह है जिसका लक्ष्य ही गड्डे के समान नीच हो - जिसकी नियत खराब हो.
मुझे लगता है समाज को या व्यक्ति को धोखा देने की बात तो दूर की है , इंसान जब स्वयं को धोखा देने लगता है तब वह पतन की ओर बढ़ने लगता है. कल रात को "देहली ६" फिल्म देख रही थी जो की मुझे बेहद पसंद है. एक पागल व्यक्ति उस फिल्म में हमेशा सभी को शीशा दिखाते हुए कहता है - "झांको" ... दरअसल वह स्वयं के अंदर झाँकने की बात कहता है .... हम सभी को इसी तरह स्वयं के भीतर झाँकने की ज़रूरत है. जब कोई इंसान अपने अंदर स्थित शीशे में स्वयं का असली चेहरा छिपाने की चेष्टा से धुल की परते चढ़ाता जाता है उसका चरित्र दूषित होता जाता है. समाज के सामने हमारी जो छवि बनती वह असली नहीं है अर्थात वह मात्र शरीर की भाँती है जिसका किसी भी प्रकार से स्वच्छ रहना "अच्छा" है परन्तु "आवश्यक" नहीं जितना की आत्मा का शुद्ध रहना आवश्यक है क्यूंकि अंतिम निर्णय कि हम कैसे है?- चरित्रवान है या चरित्रहीन? ये तो हमारा अंतर्मन और फिर उपरवाला ही करेगा....